बीत रात के सपनें – Dreams of bygone night

रात जो बीत गयी है उसके सपनें ना देखिए,
बस पैरों की ज़ंजीर बन जाएंगें,
दिन जो हातों में है बस उसके पल खिलाइए,
खुली उड़ान की तकदीर बन जाएंगे।

यार जो ना रहा है उसके ग़मों को ना गिनिए,
बस दिल के ताज़े ज़ख्म बन जाएंगें,
प्यार जो सामने है उसकी बातों को समेटिए,
वही अमन की नज़्म बन जाएंगे।

गुलाब जो मुर्जा गया है उसके पंखुड़ियों को ना सूंघये,
बस आंखों के कड़वे आंसू भर आएंगे,
गुलशन जो खिला है उसके फूलों को सहलाइए,
सांसों में ताज़ी खुशबू भर जाएंगें।

 

Yearning dreams of the bygone nights
Are only the shackles to feet,
The nurtured moments of today,
Are destinies of open flight.

Counting sorrows of the lost love,
Only give fresh wounds to the heart,
Gathering words of present love,
Always composes “Song of peace”.

Sniffing petals of withered rose,
Only brings bitter tears to eyes,
Caressing flowers of blooming garden,
Always brings fresh fragrance to breath.

 

PS : Thanks Kaushal Kishore for the inspiration : Recalcitrant Hopes

12 thoughts on “बीत रात के सपनें – Dreams of bygone night

  1. कङवें आसूं पीने की आदत डालिए,
    आप आगे बढ पाएंगे|
    जो छूटा उसको छोड दिजिए,
    तभी तो कोई नॹर मे आ जाएंगे|

    Liked by 1 person

  2. कङवें आसूं पीने की आदत डालिंए,
    आप आगे बढ पाएंगे|
    जो छूटा उसको छोड दिजिए,
    आप जीना सिख जाएंगे|

    Liked by 1 person

  3. कङवे आसूं पीने की आदत डालिए,
    आप आगे बढ पाएंगे|
    जो छूटा उसको छोड दिजिए,
    आप जीना सिख जाएंगे|

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